बूँद से संसार है और ज्ञात उसको सार है ,
रसायनों की मिलावट उसका अविचल प्यार है.
दूषित हुई मैं ,कुम्हलाया तन लिए कुत जाऊंगी ,
चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
जीवन दिया और जीव का संहार वो करने लगा ,
निज मातृ सदृश धरा का चीर वो हरने लगा ,
बादलों के पांख लेकर ओझल हो जाऊंगी
चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
सम्मेलनों की बाढ़ में और राजनीति की आड़ में
भविष्य मेरा तय होता कालिख के व्यापार में,
धरा पर संसार है (मेरा) , मैं क्रूरता सह जाऊंगी
चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
निकट शायद अंत है , यह वेदना अनन्त है
प्रयासों की योजना भी मनगढ़ंत है
इस लेखनी से काव्य जग में प्रवाहित हो जाऊंगी
चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
-- नरेन्द्र पन्त
दिनांक - ११ अप्रैल,2010
``यह एक समुद्र की बूँद की व्यथा है , जो मानव के द्वारा जल को दूषित किये जाने के कारण चाँद के पास जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर रही है .
``चाँद को प्रियतम इसलिए कहा गया है क्यूंकि ,, चाँद की गुरुव्ताकर्षण शक्ति के फलस्वरूप ज्वार- भाटा आता है समुद का जल उसकी ओर आकर्षित होता है ..
``कालिख का व्यापार - "carbon credits"
Tuesday, April 13, 2010
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2 comments:
dhanyawaad suman ji
I hope that Moon is not yoou.... rather that one is not coming to you....
I can just say that is very finest creature of yours....
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