धरती पर "जीवन " के अंत पर "जीवन " के वचन ---
उत्तर ही प्रश्न बने तो क्यूँ ना जगे लालसा,
जब औद्योगिक विकास ही मंडरा रहा हो काल सा.
" जीवन " की मृत्यु पर रुदाली जाये रूठ सी,
धरती पर जीवन की कहानी बने झूठ सी.
तो डूंढ लेना फिर मुझे , गतिमान दूरदर्शी से ,
या प्रतिविम्ब ही निहार लेना , किसी गोल अर्सी से
तारों की ओट में छिपकर खिलखिलाऊंगा,
कितना भी यत्न कर , मैं निकट नहीं आऊंगा :)
दिख जाऊं गर किसी सुदूर ग्रह के पानी में ,
या सुनाई दूं बूढी नानी की कहानी में ,
स्वार्थ के दंभ में ( उसे ), नष्ट करने का अभियान रच
यही है मानव तेरा नारकी वीभत्स सच.
--- नरेन्द्र पन्त
अप्रैल , २०१०
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