थोड़ी सी मुड़ी थी , और थोड़ा उडी थी
बादलों के मुकुट पर मोती सी जड़ी थी
मेरे सपनो को छींटे मार के धो देती ,
धरा का आलिंगन कर सखियों के संग रोती.
सवाँरती जीवन को, बुहारती पट माटी के
झीनी खुशबू में डुबो देती तन मन
घनघोर घननाद में उन्मुक्त विचरती
विरह की पीड़ा में बरबस बरसती
इस बरस पीड़ा अंतहीन बूझ पड़ती है ,
बूँद अपनी सखी का हाथ छोडती नहीं ,
बादल की पोटली में सूराख हो गया शायद
देवभूमि को लील गया वो.
और विधाता की माया देखो --
आपदाओं की छाँव में आज "अल्मोड़ा" रह रहा,
कोई दूर मेरे जन्मदिन का गीत कह रहा ..
-- नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१०
Monday, September 20, 2010
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2 comments:
Loved it ..
thnx
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