स्व तंत्र व्यभिचारी हुआ
स्वार्थ के सायों में,
पुत गए मन कालिख से
बटवारे की आहों में.
मुझे सिखा दिया गया लिखना
इन काले अक्षरों में,
कोशिश लिखने की बहुत की
पर कोई पढ़ नहीं पाता.
और ये,
बरसी उसी पुताई की
सालाना ताने देती मुझको,
मैं ढोंग करता कुछ पल देशभक्ति का
और बलवा होने छोड़ देता उसे, फिर एक साल तक.
---
नरेन्द्र पन्त
१५ अगस्त ,२०११
1 comments:
Wow proud to call u my friend
Post a Comment