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Monday, September 19, 2011

"किश्त "

मियां हम किश्तों में खुद को क़त्ल कर रहे हैं और तुम हर किश्त में जीवन बीमा एजेंट की तरह रसमलाई सुड़क रहे हो . इतनी मोमबत्तियां क्यूँ जलाई है? दीवाली है क्या ? रावन मारा गया ? अच्छा तो ये मेरे जन्मदिन की ख़ुशी में हैं . वही तो मैं सोचू इस बार रावन जल्दी कैसे मर गया , हर साल तो जब मैं छुट्टी पर घर जाता हूँ तब मरता है . समय का बिलकुल पाबन्द. हमारे मोहल्ले में ठीक बारह बजे मरता है .
        पर पड़ोस वाले मुन्नू  , अरे मुन्नू जो वानर सेना में, इस साल लौलीपोप का लालच देकर भर्ती किया गया  ,उसका कहा माने तो  रावण अंकल , राम भैया का तीर लगने से पहले ही लुडक गए थे. थोड़ी सयानी रिंकी बोली उज्जा ( ओ इजा ) कही ज़हर तो नहीं पी लिया था, तो मुन्नू बोला पता नहीं , बोतल पर "गुलाब" का फूल बना था. चलो मुन्नू को समझ तो आया कि "गुलाब" पीने से इंसान मर सकता है और हम रोजाना ऐसे कई रावण देखते हैं लेकिन कुछ सीखते नहीं .
        जब से सही और गलत का भेद समझ में आया , तब से आज तक सही राह पकड़ने में हमेशा हिचकिचाहट रही . बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि सच का रास्ता कठिन होता है, पर अभी तक हमेशा उससे विमुख रहा हूँ. जाने अनजाने सच का गला घोंटना दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया है. कॉर्नर हाउस ( एक रेस्तरां ) में बहुत दफा "डेथ बाई चाकलेट" खायी है, उस वक़्त उन करोडो लोगो की सूरत आँखों के सामने कभी नहीं  घूमती जिन्हें रात को खाली पेट सोना है और रात भर फुटपाथ पर अपनी दमड़ी का बिछोना बनाकर ठिठुरना है या सीखनी है जिनके बच्चे को गिनती ,अपना साथ छोडती हुई साँसों को गिनकर. शायद सही नाम रखा है - डेथ (मौत) तो होती ही है .. मार देता हूँ अपने ईमान को , डुबो देता हूँ उसे चाकलेट के दलदल में. आह ..छब्बीस साल लग गए  छोटी सी बात समझने में. जो चीज़े कल तक बहुत अच्छी लगा करती थी ,क्षण भर में बोझ लगने लगी हैं.
         हर साल २० सितम्बर आता है , अब समझ आया कि क्यूँ , वो ऊपर वाला हर बरस याद दिलाता है मुझे मेरे अस्तित्व की और खोजता है मेरे भीतर अपनी लौ ,जिसका मैं दम घोंटे बैठा हूँ. 
         हे ईश्वर, इस जन्मदिवस पर मुझे शक्ति देना कि मैं खुद से ऊपर ऊपर उठ सकूँ और ये जीवन स्वार्थो से परे हट ,प्राणी मात्र के उत्थान और सेवा कार्य में व्यतीत हो.

मन बहुत व्याकुल है .इकबाल साहब का पैगाम दोहरा लूं ..

 ""दयार-ए-इश्क में अपना मुकाम पैदा कर 
नया ज़माना, नए सुबह-ओ -शाम पैदा कर 
अपना तरीका है फकीरी , अमीरी नहीं 
"खुदी" न बेच , गरीबी में नाम पैदा कर"" - इकबाल

 
-- जन्मदिन मुबारक 
   नरेन्द्र पन्त