दोपहर से इन बादलों को मांज रहा हूँ
ये सफ़ेद होने का नाम ही नहीं ले रहे
एक दूसरे के करीब जाकर , कानो में कुछ कह रहे .
शायद साजिश रच रहे हैं , मेरे घर को भिगोने की
या बाट जोह रहे हैं ,धान के खेत के बोने की
रुई के फाहे हो तुम , ये श्याम रंग कहाँ से लाये ?
शायद किसी युग में तुमने ,धरती से पाप मिटाए ..
आज मानव को भिगो कर, उसके ह्रदय की कालिख धो दो
अकुलाये मन को सींच कर, प्रेम के बीज बो दो.
फिर तुम ऐसे काले बने रहना ,
मैं तुम्हे नहलाने नहीं आऊंगा.
तुम्हे उलाहना भी ना दूंगा
और तुम्हारे ही गीत गाऊंगा .
------ नरेन्द्र पन्त
जून २६, २०१०