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Sunday, January 13, 2013

ये क्या बवाल ?

जो आस इस मन की, उस पहेली के हल सी
'बूझो बंजारे की धरती पर, लहलहाती फसल सी '
एक बरस का जीवन कपास की खेती सा ज्यूँ
नींद में हैं बादल, न पूछो उनका हाल क्यूँ ?
खुद को जवाब दूं, करूँ सवालो पर सवाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

कलम की नोक तोडूं , या हवा को साथी कर
उड़ने दूँ काले गुबार को , सफ़ेद पन्नो की तरह ।
रखूँ महफूज़ गुल को गुलज़ार होने दूं क्यूँ ?
किससे करूँ दुआ, कश्ती के पार होने तक ।
हाथी घोड़े ऊँट की बाज़ी और मेरी कछुवे की चाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

--
नरेन्द्र पन्त
13 जनवरी , 2013

Saturday, June 26, 2010

बादलों की धुलाई

दोपहर से इन  बादलों को मांज रहा हूँ
ये सफ़ेद होने का नाम ही नहीं ले रहे
एक दूसरे के करीब जाकर , कानो में कुछ कह रहे .

शायद साजिश रच  रहे हैं , मेरे घर को भिगोने की
या बाट जोह रहे हैं ,धान के खेत के  बोने की

 रुई के फाहे हो तुम , ये श्याम रंग कहाँ से लाये ?
शायद किसी युग में तुमने ,धरती से पाप मिटाए ..

आज मानव को  भिगो कर, उसके ह्रदय की कालिख धो दो
अकुलाये मन को सींच कर, प्रेम के बीज बो दो.

फिर  तुम ऐसे काले बने रहना ,
मैं तुम्हे नहलाने नहीं आऊंगा.
तुम्हे उलाहना भी ना दूंगा
और तुम्हारे ही गीत गाऊंगा .

  ------ नरेन्द्र पन्त
         जून २६, २०१०