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Friday, February 11, 2011

ज़िन्दगी की पहेली

आँख मलते जागती है ,घुटनों  पर भागती है
नाजाने क्यूँ बचपन की,सीमायें लांघती है

फिर  खुली आँख सोती है हर ठोकर पर रोती है
नानी की कहानी , बस सपनो में होती है 

और मैं
तुरुप की चाल चलू ,इसे लूटने  की आश में
रिश्तो की गाँठ लगाऊं , गले की फाँस में
ज्यू खिंचती गयी  डोरी , वो लहराई आकाश में
आह !  कट गयी देखो , अनंत की आश में


अब आँखें बंद हैं ,और नाड़ी भी थक गयी
गतिमान इस काल में ,मेरी दुर्गति रुक गयी
अब कोई दूसरा इस पहेली को बूझता है
देखूं तनिक, उसे क्या हल सूझता  है.

    -- नरेन्द्र पन्त
  ११ फरवरी , २०११