विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,
दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है,
आशा की पोटली में उनको संजो पाता हूँ ,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .
पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,
सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपता
मन के इशारों को किनारा करते हुए,
दो गज दूरी , दो बरस में नापता .
पथिक की मुख भंगिमा से दिशाओं को माप,
"थार" के विस्तार में राह दिखलाता हूँ.
रेत के सागर में संशयो को विरल कर,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .
---- नरेन्द्र पन्त
अप्रैल , २०१०
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