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Friday, March 30, 2012

" पतंगे के पर "

कहाँ छिपी धड़कन ,टटोलू कलाई किसकी
कहाँ छुपा वो तन ? 
जो बादलो के आईने में ,
खुद को उकेरता , और बरस जाता ,
दोपहर की  धूल  भरी आंधी के बाद .
जिसकी आखिरी सांस का स्वर गूंजता ,
गरजती इस बदली को , मात देता .

सबक गीता का , पढ़ लिया , गुन लिया 
पर  व्यर्थ बुझ जाता क्यूँ , ये ज्ञान का तारा
जब सांस का दीपक , विदा करता लौ को 
पतंगे के परों पर बिठा. 
अनजान नगर या  मायके को ?

रीत के विपरीत है ,क्षण भर विस्मित हूँ ,
और व्याकुल भी , उत्सुक भी कि
बादल फिर घिर आये हैं.
पतंगे के पर निकल आये या नहीं ?

 -- नरेन्द्र पन्त 









Saturday, May 1, 2010

उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,
दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है,
आशा की पोटली  में उनको  संजो पाता हूँ ,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,
सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपता
मन के इशारों को किनारा करते हुए,
दो गज दूरी ,  दो बरस में नापता .

पथिक की मुख भंगिमा से दिशाओं को माप,
"थार" के विस्तार में  राह दिखलाता हूँ.
 रेत के सागर में  संशयो को विरल कर,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

           ---- नरेन्द्र पन्त 
                अप्रैल , २०१०