अब तेरा ख़त पढ़कर गुनकर ,
मैंने अनछुआ अंकित किया .
छेड़कर अमिया की बातें,
कोयल को आतंकित किया .
घिरी हुई है वो इस नगरी में,
तिनको की दीवारों से,
जब बेमौसमी आम की बोरों ने
माली को शंकित किया.
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नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012
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नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012
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