मेरे हिस्से के बादल,
अँधेरे से लीप दे धूप,
कोयल को पता न चलने दे उजालों के वो गीत ,
जो बरसो मै आखिरी पन्ने सी ,
हाथों की लकीरों में कुरेदता रहा.
रख ले भर कर जो आंसू आज टपके हैं ,
दूर समंदर किनारे पहाड़ी से जा गले लग ,
सुना गुस्ताख ने बहुत नमक बटोर लिया किनारे पर.
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नरेन्द्र पन्त
१५ जनवरी , २०१२
2 comments:
hmmmm. mann to bada hai almora wapas jaane ka.. sahi??
are tu samjhi nahi kavita ka bhav
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