१:
लिखा पढ़ी के चक्कर में
जो लग गयी हाथ स्याही
रंग डाली किस्मत
अब फेर कर पानी
कौन (सा) रंग खोजू मैं .
क्यूँ बूझूं अगला कारनामा क्या रंग होगा ?
२:
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
चलो पतंग उड़ायें
हम न मिलें,
डोर को तो मिलने दो .
कट जाएगी? क्या?
यही इश्क है
यही इश्क है
नहीं तो ,
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?
३:
वो दुबकी , उस झाड के पीछे
( मेरे प्यारे खरगोश daisy की याद में . मिस यू daisy )
-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?
३:
वो दुबकी , उस झाड के पीछे
मेरे हाथ में लगे कांटो में
इन्द्रधनुषी रंग खोजती ,
कुछ दिन पहले का वाकया है
जाने कौन से कोने में जा छुपी,
अब किताब के पन्ने भी पीले
और सुबह की धूप भी
अब और लहू में कितने रंग मिलाऊं
वो सफ़ेद रंग कहाँ से लाऊं?
-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)
2 comments:
Bahut khub pantji... :)
Wow too good my friend you are really really talented . V much proud to have a buddy like u
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