Monday, January 19, 2015

भ्यास

अल्माड़ में नालि  बगनयी , कच्यार पट्ट बाट हये गयी 
नगर पालिका जे के छ , नरक पालिका हये ग्ये ।
मु  पजाम मल्ली के स्वेर बेर हिटनु  , 
पढ़ी लिखी मैस बोलनी ,
तौ  देखो कार्टून ।

कि करू हो, तुमर जस सहुर कां ,
तुमुल  झाड़ झाड़ बेर बाट में डालो  , 
घरक कुड़ देइ बटि भनका हालो,
मु ख्वार बचुने टिनक छात ढकनू  
पढ़ी लिखी मैस बोलनी ,
अये ग्यो कार्टून ।

जस अल्माड़क हाल छ , 
तौ प्रशासनक कमाल  छ , 
मैसनक चाल छ, पुरि दाल काव  छ। 
पोरी बेर ले कौ , आज ले कै गयुं 
जाग जाओ , तुम तो सैप छा 
म्योर  कि, 
मि तौ  भ्यास-क-भ्यासे  रे गयुं। 

--
नरेंद्र पंत
जनवरी २०१५


Wednesday, December 31, 2014

"मैं यूँ चला "

विगत वर्ष के थक जाने पर , आई नए साल की बारी 
न समझू ये बढ़ती है , या घटती जीवन की पारी 
अभी पतझड़ को थामे , मैं करुँ आग का अंदेशा
पर उड़ते पन्ने , उड़ती स्याही , कैसे भेजूँ संदेशा ।
शब्दों की डोरी में भावों को उलझाता,
टालूं  ये दिन, महीने, साल की बला,
मैं यूँ चला , मैं यूँ चला ।

इस सर्दी को , धूप की चादर की मांग,
कृषक के नयनो को , खादर की मांग ।
कोई कहे नदिया से , बिन बाढ़ के इस साल तू ,
माटी को सोना करने को बाण चला । 
सारी दुविधाओं पर एक-एक कील ठोकता,
यूँ दिखलाऊ नव एकत्व की कला,
मैं यूँ चला ,मैं यूँ चला।  

-- 
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१४।

Friday, September 20, 2013

" जीजिविषा "


पलों की जंग, कुछ झुलसे कुछ जीते पल,
फिर एक पहेली , फिर बूझू उसका हल ।
लाज रखूं  ताक पर , देख कर जीजिविषा
छुपते हुए सूरज शर्म से हुए लाल ।
इठलाता, हाथ पर पत्ती से छाप मारूं,
बुनूं  लकीरों के मुहाने पर कंटीले जाल ।

दिन और रात की बदलती पाली,
लुका-छुपी का खेल, मैदान भी खाली ।
हारूँ बरस  की बाज़ी पर कदम बढाकर,
नोंच लूँ उस पार से इस पार एक साल ।
भूलूं सतरंगी जीवन का छोर आखिर,
कोरे कागज़ पर सफ़ेद स्याही का कमाल ।

--
नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१३

Sunday, January 13, 2013

ये क्या बवाल ?

जो आस इस मन की, उस पहेली के हल सी
'बूझो बंजारे की धरती पर, लहलहाती फसल सी '
एक बरस का जीवन कपास की खेती सा ज्यूँ
नींद में हैं बादल, न पूछो उनका हाल क्यूँ ?
खुद को जवाब दूं, करूँ सवालो पर सवाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

कलम की नोक तोडूं , या हवा को साथी कर
उड़ने दूँ काले गुबार को , सफ़ेद पन्नो की तरह ।
रखूँ महफूज़ गुल को गुलज़ार होने दूं क्यूँ ?
किससे करूँ दुआ, कश्ती के पार होने तक ।
हाथी घोड़े ऊँट की बाज़ी और मेरी कछुवे की चाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

--
नरेन्द्र पन्त
13 जनवरी , 2013

Wednesday, August 15, 2012

"माँ तुझे सलाम"

माँ आज तुझे सलाम , कल करूँगा नीलाम,
सह लेगी अगले बरस की सलामी तक?
बदले आज़ादी के मायने , बचपन के लड्डू  से,
व्यंग में झुलसी जवानी तक.
कब तक भरम को गहराऊँ, साँसों को फुसलाऊ
तिरंगे की इस दो  दिनी रवानी पर.
बरसो इस नाव को खेकर,लहू के कई रंग लेकर
लो आ पहुंचे
उस गुलामी से इस गुलामी तक.
माँ , सह लेगी अगले बरस की सलामी तक ?

-- नरेन्द्र पन्त
15 अगस्त , 2012 

Sunday, June 24, 2012

इश्क

न कर इश्क पर बनने दे ऊन को गोला ,
इक स्वेटर में बुन जायेंगे ,
तू दिल के पास रहना ,मैं हाथ के किनारे 
कभी किसी दिन, कोई गलती तो होगी हाथ से 
जब मैं पोंछ लूँगा तेरे तन पर पड़े वो छींटे.
या चबा लेगा दांतों तले मुझे वो नन्हा 
फिर कितनी जोर से धड़का ये दिल ,
जब मालूम होगा, तू इश्क को खुदा मानेगी.

-- नरेन्द्र पन्त  

Friday, June 22, 2012

सवेरा

# जून 22, 2012  :

          आँखों में सोयी हुई नींद , ताज़ा अखबारी कागज़ की महक और बासी खबरे , अब लुट जाने को बेताब हवा के झोंको में तैरते वो रात की रानी के चंद प्यादे जो सो नहीं पाए और कूद गए , उन्हें जमीन से बीनती पड़ोस वाली दादी , या फिर लाठी से डाल  को झुकाते वो मिस्टर कपूर , बाज़ की सी तेज़ी से चुन लेते दो फूल और सफ़ेद बुशर्ट की जेब में बंद कर लेते उनकी खुशबू . किताबो से भरा बस्ता लटकाए वो मासूम , आजकल सुबह स्कूल जाने से पहले  नहाते नहीं  ,ठण्ड बहुत है. मकड़ी के जाल अपनी आँखों से हटाते ,माँ , बाप , बेटा तीनो बस्ता लटकाए हैं और हाथ में एक एक टिफिन पकडे निकल पड़े हैं घर से. पड़ोस के मिस्टर श्रीकांत आज पहली बार जिम होकर आये हैं और ऊंची आवाज़ में  कसरत के फायदे गिना रहे हैं , टीनू अपने पिताजी की चप्पल पहने  फट फट की आवाज़ करता दौड़ रहा है, मौसम ऐसा है  कि बंगलोर में कश्मीर का मज़ा आ रहा है , और मैं अपने घर का दरवाजा खोले अखबारी खबरों का अचार बना रहा हूँ , साथ ही इन सभी लोगो की घूरती नजरो का शिकार बन रहा हूँ , शायद नाराज़ हैं ये .. लेकिन कौन कहता है कि "नाराज़ सवेरा है "?